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Showing posts from May, 2021

इस्लाम ही देता है पुरूष को एकपत्नी का आदेश

एक सवाल इण्टरनेट पर बहुत दिनों से घूम रहा है :- //इसलाम मे १ आदमी बहुत औरते रख सकता है, पर १ औरत बहुत आदमी क्यों नहीं...?? क्यों भाई धर्मं को तो ये सिखाना चाहिए कि एक ही औरत रखो, उस से प्रेम करो, परायी नारी पर नजर मत डालो। खैर ये तो हिन्दू धर्मं सिखाता है।...// मुझे बड़ा आश्चर्य होता है कि अपने धर्म के बारे मे मेरे हिन्दू भाई इतने अज्ञानी कैसे हो सकते हैं कि वो ये कहें कि हिन्दू धर्म एक पत्नी रखने की बात सिखाता है ?? .... मेरे भोले भाईयों, आपको पता होना चाहिए कि हिंदू धर्म कहीं भी एक पत्नी की वकालत नहीं करता ... , आज यदि हिंदू एक पत्नी कानून से चलते हैं, तो इस कानून का पूरा का पूरा श्रेय, हमारे देश के संविधान निर्माता बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर जी को जाता है, जिन्होंने देश की हिन्दू विधि मे हिन्दुओं को केवल एक पत्नी रखने का कानून बनाया, इससे पहले हिंदू पुरूषों के लिए पत्नियो की कोई निर्धारित संख्या नहीं थी और वे असीमित संख्या मे स्त्रियों से विवाह कर सकते थे .... और अधिकांश ऐसा होता था कि एक बार विवाह कर के पुरुष कभी अपनी उस पत्नी की ओर दोबारा पलटकर नहीं आता था, क्योंकि वो अपनी नई नई...

शाहबानो प्रकरण: मुस्लिम ही ठगे गए

इस्लाम के अनुसार तलाक व मेहर चुकाने के बाद ये नियम नही है, कि पति तलाक लेने के बावजूद जीवन भर पत्नी का भरण पोषण करे , क्योंकि ये पुरूषों के साथ न्याय नहीं होगा, विशेषकर उन पुरूषों के लिए जिनकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं, और पत्नी द्वारा लगातार मानसिक और आर्थिक कष्ट दिए जाने के कारण उसने तलाक लिया है, यदि वो व्यक्ति पहली पत्नी का भरण पोषण ही करता रह जाएगा तो अपनी कमजोर आर्थिक स्थिति के कारण कभी दोबारा घर बसाने की सोच भी नहीं पाएगा , और आत्महत्या को या तलाकशुदा पत्नी को रास्ते से हटाने जैसे खतरनाक कदम उठाने को बाध्य हो जाएगा .... जैसी स्थिति हिन्दू विधिक तलाक पाए पुरूषों के सामने आती भी रहती है ... कुछ लोगों का विचार है कि तलाक की संभावना को टालने के लिए पति पर तलाक के बाद भी पत्नी के भरण पोषण का भार उठाने का भय दिखाना सही है , .... पर ये बात भी युक्तियुक्त नहीं है ... आजीवन भरण पोषण का बोझ डालकर पुरुष को तलाक देने से डराया जाएगा तो समस्या वहीं रह जाएगी, यानी पति पत्नी को तलाक नही देगा, और बोझ बन चुके वैवाहिक सम्बन्धो को केवल ढोया जाएगा या पति पत्नी पर बेतरह अत्याचार करने लग जाएगा फिर ये...

मुस्लिम महिलाओं को है पति से तलाक लेने का समान अधिकार

कुछ दिन पहले टीवी पर एक क्रिश्चियन महिला समाज सेविका का इण्टरव्यू देखा जो किसी समय मे जबरदस्त घरेलू हिंसा की शिकार रही थीं, ये जानकर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ कि पति द्वारा इतनी क्रूरता से अकारण पिटाई करने, अंग भंग और हत्या तक कर देने की स्थिति मे भी 30 वर्ष पहले तक देश मे एक ईसाई महिला को अपने पति से तलाक लेने का अधिकार नहीं था (अब शायद मिल गया हो, मुझे इस विषय मे जानकारी नहीं).... इसी तरह हिंदू महिलाओं को भी हिन्दू मैरिज एक्ट 1955 से पहले कितनी भी पीड़ादायक स्थिति मे अपने पति से तलाक लेकर खुद को सुरक्षित कर लेने का अधिकार नहीं था ... फिर मैं देखता हूँ, इस्लाम धर्म की ओर, जिसमें शुरू से ही पुरूषों के साथ साथ स्त्रियों को भी ये आजादी है, कि जब वैवाहिक जीवन दुर्भाग्यवश इतना अप्रिय और असहनीय हो जाए कि साथ रहना मुश्किल हो जाए तो ऐसे अप्रिय सम्बन्धो का बोझ ढोते रहने की बजाय पति और पत्नी एक दूसरे से सम्बन्ध विच्छेद कर के अपना जीवन नए सिरे से शुरू कर सकते हैं । अन्य धर्मों मे जहाँ तलाक का विधान नहीं था ऐसे दुष्कर हो चुके सम्बन्धो मे पति या पत्नी की हत्या तक करने कराने की नौबत आ जाती थी, ... उसक...

स्त्री का सम्मान, तय करते हैं संस्कार और संस्कारों को तय करता है धर्म

देश मे इतनी अधिक संख्या मे बलात्कार क्यों हो रहे हैं ? क्या सिर्फ कानून का कमजोर होना ही इसकी एकमात्र वजह है ? फिर ये सवाल उठता है कि कानून तो देश के उन हज़ारों सभ्य पुरुषों के लिए भी कमज़ोर है जो बलात्कार क्या स्त्रियों पर गलत नजर तक नहीं डालते ... क्या वे सभी मर्द नही ?? असल बात ये है कि कानून की बात दीगर रही, अहम बात है बचपन से मिलने वाले संस्कार, जो व्यक्ति की अच्छी या बुरी शख्सियत बनाते हैं .... अगर किसी लड़के को बचपन से पराई स्त्रियों का सम्मान करना सिखाया जाता है, तो वो बड़ा होकर ऐसा ही करेगा, और अगर किसी के मन मे बचपन से ये बात बैठ जाए कि औरत केवल भोगने की चीज है, तो फिर वो बड़ा होकर औरत के शरीर पर ही भूखी नजर डालेगा औरत की गरिमा पर नहीं.... तो ये संस्कार हमें धर्म से मिलते हैं, और भाग्य से हमारे देश का लगभग हर व्यक्ति किसी न किसी धर्म मे आस्था जताता है फिर हमारे देश मे इतनी बड़ी संख्या मे बलात्कार क्यों ??? असल मे देखने को मिलता है कि बलात्कार और व्यभिचार जो कि बलात्कार तक पहुंचने का चोर दरवाज़ा है, उसे किसी अन्य धर्म ने उतने स्पष्ट ढंग से जघन्य पाप नहीं बताया जितने स्पष...

हदीसों पर घरेलू हिंसा के आरोपों का उत्तर

जैसा कि मै अपने पिछले लेख मे बता चुका हूँ कि इस्लाम मे घरेलू हिंसा की बिल्कुल अनुमति नहीं है इसके बावजूद विरोधी कुछ हदीसो की गलत तरीके से व्याख्या कर के ये सिद्ध करना चाहते हैं कि इस्लाम मे पत्नी को पीटने की शिक्षा दी गई है ... आइए देखें इन आरोपों मे कितनी सत्यता है 1• पहला प्रमाण हदीस मे वाइफ बीटिंग का दिखाया जाता है सही मुस्लिम 4/2127 मे मां आएशा रज़ि. का ये बयान कि "नबी सल्ल. ने मेरे सीने पर मारा, जिससे मुझे दर्द हुआ " उत्तर - इतनी सी बात पढ़कर ऐसा ही लगता है जैसे नबी सल्ल. ने माज़अल्लाह मां आएशा रज़ि. को पीटा हो, परंतु जब आप ये हदीस पढ़ते हैं तो पाएंगे कि यहाँ कोई विवाद नहीं हो रहा था जिसमें मारपीट की नौबत आए, बल्कि अल्लाह के आदेश पर रात को चुपचाप घर से निकले नबी सल्ल. का पीछा मां आएशा रज़ि. ने किया था, ये जानकर नबी सल्ल. को स्वाभाविक ही दुख हुआ कि अपनी जिन पत्नी को नबी सल्ल. दिलोजान से प्रेम करते थे उन पत्नी ने ही नबी सल्ल. की जासूसी की, और इस हदीस की व्याख्या करते हुए इमाम नानवी ने लिखा है कि शब्द "ल-ह-दा" का सही अर्थ मारना नहीं बल्कि धकेलना है तो नबी सल्ल...

क्या इस्लाम घरेलू हिंसा की अनुमति देता है?

जिस वक्त मैं 14-15 साल का लड़का था, इस्लाम के खिलाफ एक जुमला जगह जगह पढ़ सुन कर बड़ा शर्मिन्दा हुआ करता था कि कुरान मे अल्लाह ने पतियों की आज्ञा न मानने वाली पत्नियों को पीटने का उनके पतियों को आदेश दिया गया है ... मैं खिसिया कर रह जाता था जब अखबारों मे पढ़ता था कि फलां फलां मौलाना ने स्त्रियों को पीटने के गुर बताने वाली पुस्तक लिखी है ... ... आज भी, बहुत से मुस्लिम और गैरमुस्लिम लोगों का ख्याल है कि बीवी को काबू मे रखने के लिए और उससे अपनी जायज़ नाजायज बातें मनवाने के लिए बीवी की पिटाई करने का हक मुस्लिम पुरूषों को कुरान ने दिया है ... लेकिन ये ख्याल रखना कुरान पर एक बड़ा झूठ बांधना है ... छोटी मोटी बातों पर बीवी पर हाथ उठाने की इजाज़त कुरान पाक कतई नहीं देता, बल्कि ऐसे मौकों पर अपने आप पर काबू रखने का हुक्म ही कुरान और हदीस ने शौहर को दिया है क्योंकि जैव वैज्ञानिक आधार पर हर पुरुष की बनावट स्त्री के मुकाबले अधिक शक्तिशाली व स्वभाव आक्रामक रहता है, इस बात को ध्यान मे रखते हुए कि अन्य पुरूषों की तरह मुस्लिम पुरुष भी अपनी स्त्रियों पर अत्याचार और हिंसा न करने लगें, अल्लाह ने बड़ी ज़िम्...

दहेज प्रथा और इस्लाम

हमारे देश मे महिलाओं की इतनी शोचनीय दशा होने के पीछे एक बहुत बड़ा कारण है दहेज प्रथा ,केवल इसी प्रथा के भय से ही हमारे देश मे लाखों लड़कियों को गर्भ मे ही मार डाला जाता है, और जो गलती से पैदा हो जाती हैं , वो नारकीय जीवन जीने को बाध्य होती हैं, सोच कर देखा जाए तो इसी एक दहेज की कुप्रथा के कारण ही हमारे समाज की बेटियों को हर क्षेत्र मे दबाया जाता है, विडंबना देखिए कि वधू पक्ष ही वर को भरपूर दहेज भी दे, अपनी बेटी को अघोषित रूप से 24 घण्टे की सेविका बनाकर वर पक्ष को दे दे, फिर भी रौब और अकड़ वर पक्ष दिखाए, और कन्या पक्ष उसके आगे झुका रहे.. शादी से पहले मां बाप के कंधो का बोझ होने की हीनता लड़कियों के मन बैठा दी जाती है ... और शादी के बाद कम दहेज लाने को लेकर ससुराल मे मिलने वाली मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना को परिवार की मान मर्यादा बनाए रखने के लिए लड़की पर ही हर ओर से दबाव डाला जाता है ...ये स्थिति केवल गांव कस्बों की कम पढ़ी लिखी लड़कियों की ही नहीं बल्कि बड़े शहरो की उच्च शिक्षित और माडर्न लड़कियों की भी परिवार और समाज के दबाव मे यही नियति होती है लेकिन बात यदि थोड़ी शारीरिक मानसिक ...

अल्लाह के आदेश का उल्लंघन है इंस्टेंट तलाक़

कुछ दिनों पहले मैने अखबार अमर उजाला मे हनफी स्कूल को मानने वाले यानी देवबन्दी और बरेलवी विद्वानों के विचार "तीन तलाक" जिसे कानूनी भाषा मे "तलाक उल बिद्दत" कहा जाता है, के बारे मे पढ़े, सभी विद्वान तलाक के इस तरीके को गलत और कुरान व हदीस की शिक्षा के विपरीत बता रहे थे ... लेकिन फिर भी खुलकर किसी ने ये नहीं कहा कि इस विधी पर पूर्ण प्रतिबंध लगना चाहिए... दरअसल, एक बैठक मे तीन बार तलाक के शब्द उच्चारित कर के अपनी स्त्रियों को तलाक दे देने का तरीका नबी स. से पूर्व अरब मे प्रचलित था, लोग जब तब अपनी पत्नी को छोटी मोटी बातों पर महज़ मज़ा चखाने के लिए तलाक देकर छोड़ देते ... और फिर जब कभी दिल मे आता तो फिर उसी स्त्री से विवाह कर लेते, यानी औरत की जिन्दगी हमेशा डांवाडोल ही रहती । उसे कुछ पता न रहता कि कब किस बात पर उसका पति उसे तलाक दे देगा, और फिर कभी अपनाएगा भी या नहीं ... इस्लाम ने सबसे पहले तो इस एक बैठक मे तलाक देने की कुप्रथा को खत्म किया, और तलाक की प्रक्रिया को तीन महीने लम्बा बनाया जिस समय मे किसी भी वक्त तलाक का फैसला वापस लिया जा सकता है ... और तलाक के फैसले पर कई...

हलाला की वास्तविकता क्या है ?

फिल्म मीडिया मे तलाक और हलाला की रस्म की तस्वीर देखिए ज़रा "मर्द ने अपनी मर्दानगी के नशे मे चूर होकर बेचारी औरत को तलाक के तीन पत्थर मार दिए, और ज़िन्दगी भर के लिए बांधा गया शादी का बंधन एक झटके मे टूट गया .... रोती कलपती मजबूर औरत माएके आ बैठी, और अपने नसीब पर रो रो कर आंखे सुजाती रही .... फिर एक दिन उसके शौहर को अपनी बीवी पर प्यार आया, और शौहर अपनी मिल्कियत यानी अपनी बीवी के जिस्म को अपने से पहले किसी गैर मर्द को सौंपने पर 'मजबूर' हो गया ताकि वो दूसरा आदमी उसकी तलाकशुदा से शादी कर के उसके साथ रात गुजारे और फिर उसे तलाक दे दे ताकि हलाला की रस्म पूरी हो सके ॥" हमारे देश मे सिनेमा और टीवी के जरिए मुस्लिमों मे तलाक के विधान का बहुत ही गलत रूप, और हलाला की रीति का बेहद अश्लील रूप से वर्णन किया गया है, इन विधानो को स्त्री पर अत्याचार दिखाया गया है, वास्तविकता ये है कि हलाला का क़ानून तलाक़ देने से मर्दों को रोकने के लिए बनाया गया है, हलाला का क़ानून पुरुषों के लिए एक चेतावनी है कि अगर उन्होंने अपनी पत्नी को तलाक दे दिया तो दोबारा उनकी आपस में शादी असम्भव हो जाएगी ... इसलि...

क्या नबी (सल्ल०) ने स्त्रियों में अपशगुन होने की बात फ़रमाई ?

एक आपत्ति ये है कि सही बुखारी, किताब 62 यानी निकाह की किताब मे मुस्लिमों को निकाह के विषय मे सलाह देते हुए नम्बर 30,31 और 32 पर एक हदीस है कि नबी स. फरमाते है कि " अपशगुन व दुर्भाग्य स्त्री , घर या घोड़े मे हो सकता है .." तो प्रश्न ये है कि यदि इस्लाम स्त्रियों और पुरूषों की समानता का दावा करता है तो फिर उपरोक्त हदीस मे नबी स. ने घर, घोड़े और स्त्री को अपशगुन का कारण क्यों कहा ?? जैसा कि मैं बार बार कहता आ रहा हूँ कि मुस्लिमों के लिए सबसे बड़ा धार्मिक दिशा निर्देश है पवित्र कुरान, जिसके विपरीत जाने वाली हर शिक्षा त्याग दी जाती है चाहे वो किसी भी हदीस मे क्यों न हो ... तो अल्लाह के अतिरिक्त किसी और चीज को अपना भला होने का कारण समझना या अपने दुर्भाग्य का किसी व्यक्ति को कारण समझना पवित्र कुरान की इस शिक्षा का विरोध करना है कि किसी व्यक्ति के सौभाग्य या दुर्भाग्य पर केवल अल्लाह का प्रभुत्व है ( सूरह अनआम की आयत 17) ... और किसी व्यक्ति के दुर्भाग्य का कारण उस व्यक्ति के अपने ही कर्म होते हैं (सूरह निसा की आयत 79) दूसरी बात ये कि किसी हदीस पर, विशेषकर संक्षेप मे बयान की गई हदीस ...

इस्लाम में बिना विधिवत विवाह दासी से सम्बन्ध ?

प्रारम्भिक दौर के इस्लाम की एक व्यवस्था पर एक प्रश्न अक्सर पूछा जाता है कि प्राचीन समय मे मुस्लिमों को बिना विधिवत विवाह के अपनी दासी से शारीरिक सम्बन्ध बनाने की अनुमति क्यों दी गई थी? क्या ये किसी स्त्री का शोषण और व्यभिचार नही..??....... आइए इसका उत्तर जानने की कोशिश करते हैं ..॥ सोचिए कि आपके शहर का रेड लाइट एरिया बंद करवा दिया जाए और आपसे कहा जाए कि उन शरीर बेचने वालियों से आप शादी कर के उनके जीवन यापन का सहारा बन जाएं तो कितने लोग राज़ी होंगे इसके लिए ?? सोच मे पड़ गए न ? प्री इस्लामिक अरब समाज मे दो प्रकार की दासियां होती थीं एक तो वे जो या तो किसी गुलाम स्त्री से पैदा होने के कारण जन्म से ही गुलाम होती थीं या फिर किसी गरीब और जाहिल घराने मे पैदा होती थीं और अपने ही घरवालों द्वारा बचपन मे ही बेच दी जाती थीं , और ये प्रचलित था कि गुलाम की अपनी कोई इच्छा अनिच्छा नही होती, बल्कि उसको खरीदने वाला उस गुलाम का जैसे भी चाहे, उपयोग या उपभोग करे, प्रीइस्लामिक अरब में एक गुलाम स्त्री को अपना शरीर अपने मालिक को सौंपना ही पड़ता था, वो किसी भी प्रकार से अपने सतीत्व को बचाकर नही रख सकती थी, ....

मत मारो बेटी को, जीने दो

बीबीसी की रिपोर्ट बताती है कि एक नए अनुसंधान के मुताबिक भारत में पिछले 30 सालों में कम से कम 40 लाख बच्चियों की भ्रूण हत्या की गई है. अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका 'द लैन्सेट' में छपे इस शोध में दावा किया गया है कि ये अनुमान ज़्यादा से ज़्यादा 1 करोड़ 20 लाख भी हो सकता है. सेंटर फॉर ग्लोबल हेल्थ रिसर्च के साथ किए गए इस शोध में वर्ष 1991 से 2011 तक के जनगणना आंकड़ों को नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के आंकड़ों के साथ जोड़कर ये निष्कर्ष निकाले गए हैं. शोध में ये पाया गया है कि जिन परिवारों में पहली सन्तान लड़की होती है उनमें से ज़्यादातर परिवार पैदा होने से पहले दूसरे बच्चे की लिंग जांच करवा लेते हैं और लड़की होने पर उसे मरवा देते हैं. लेकिन अगर पहली सन्तान बेटा है तो दूसरी सन्तान के लिंग अनुपात में गिरावट नहीं देखी गई.शिक्षित और समृद्ध परिवारों में कन्या भ्रूण हत्या की दर निर्धन और अशिक्षित परिवारों से कहीं ज्यादा पाई गई । कन्या शिशु हत्या के इतिहास की ओर हम ध्यान करें तो पाते हैं कि पहले तो समाज ने स्त्री को हवस पूर्ति का सुलभ साधन बनाया, दहेज लेकर स्त्री और उसके अभिभावकों का आर्थिक शोषण क...

पत्नियों के साथ बहुत भला सुलूक करना सिखाता है इस्लाम

इस्लाम से सशंकित हमारे मित्र अक्सर इस्लाम मे पत्नियो के साथ बुरे व्यवहार का शोर मचाते हैं, लेकिन जहाँ तक मै समझता हूँ तो ऐसा है कि, अगर इन्सान ऐन इस्लामी तालीम पर चले तो वो दुनिया का सबसे बेहतर पति साबित होगा, और उसकी बीवी सबसे भाग्यशाली पत्नी बीवियों से सुलूक के बारे मे मुझे इस्लाम की ये तालीम बहुत पसंद आती है कि बीवी को न सिर्फ उसकी खूबियों, बल्कि उसकी कमियों के साथ भी मुसलमान शौहर कुबूल करे,और औरत का स्वभाव बदलने की जबरदस्ती न करे बल्कि वो जैसी है उसे वैसे का वैसा कुबूल कर के उसके साथ अच्छा सुलूक करता रहे ...॥ पवित्र कुरान मे अल्लाह का फरमान है कि ... "अपनी पत्नी के साथ भले तरीक़े से रहो-सहो। और यदि वो तुम्हें पसन्द न हों, तो सम्भव है कि एक चीज़ तुम्हें पसन्द न हो लेकिन दूसरी ओर अल्लाह ने उसमें बहुत कुछ भलाई रखी होगी," (सुरा 4 आयत 19) इसी तरह आप स. की ये हदीस शरीफ हजरत अबू हुरैरा से रिवायत है, नबी (सल्ल0) ने फरमाया, "अपनी औरतों के साथ भला सुलूक किया करो, इसलिये कि औरतें पसली से पैदा की गई हैं और पसली टेढ़ी होती है, अगर तुम पसली सीधी करना चाहोगे तो वह टूट जायेगी और ...

इस्लाम और महिला सशक्तिकरण

गैर मुस्लिमों और अशिक्षित मुस्लिमों के बीच भी ये भ्रम फैला हुआ है कि इस्लाम स्त्रियों को केवल चूल्हे चौके, और पति और बच्चों तक सीमित रखने का पक्षधर है और घर की चारदीवारी के बाहर स्त्री की कल्पना इस्लाम मे नहीं है .... इसी आशंका के साथ हमारे एक मित्र ने प्रश्न किया था कि क्या इस्लाम मे स्त्री को कहीं मुफ़्ती खलीफा बादशाह ऐसा कुछ बनाने को लिखा हो तो उस पर प्रकाश डालिए.... ..... मै मानता हूँ, कि वास्तव मे इस्लामी ज्ञान पर पुरुषवादी मानसिकता ने अनाधिकृत रूप से अतिक्रमण कर रखा है, इसलिए ऐसे भ्रम पैदा होते हैं कि इस्लाम स्त्रियों को बिल्कुल स्वतंत्रता नहीं देता.... खैर ये भ्रम निरा भ्रम ही है, और इस्लाम ने स्त्री को मां, बहन, बेटी, नर्स, गुरु और धर्म गुरु, बिजनेस वुमेन और पत्नी की अनेक भूमिकाओं मे पूरा सम्मान और असंख्य अधिकार सौंपे हैं, मां आएशा सिद्दीक़ा रज़ि. इस्लाम की बहुत बड़ी और बहुत सम्मानित धर्म गुरु थीं, जिन्होंने पुरूषों को भी उतनी ही कुशलता से धार्मिक ज्ञान दिया जितनी कुशलता से स्त्रियों को, नबी सल्ल. के ही समय मे जब काफिरों के विरुद्ध मुस्लिमों को युद्ध करना पड़ता, तो मुस्लिम ...

मुस्लिम पुरुष का दूसरा विवाह, और पहली पत्नी की सहमति की आवश्यकता

कुछ महीनों पहले इस्लाम मे बहुविवाह की अनुमति पर पोस्ट करते समय मैंने ये लाइन भी उसमें शामिल करी थी कि दूसरी शादी मर्द तभी कर सकता है जब उस की पहली पत्नी को इस विवाह से कोई आपत्ति या तकलीफ न हो ॥ इस बात पर कई मुस्लिम भाईयों ने मेरा विरोध किया कि दूसरी शादी के लिए पुरुष को पहली पत्नी की इजाज़त की कोई जरूरत नही है, और मै लोगों को गलत संदेश दे रहा हूँ .... आज फिर ये बात उठी तो मै समझता हूँ कि इस मुद्दे पर इस्लाम की शिक्षा से मैने जो सीखा है वो स्पष्ट कर दूं, कुछ सम्मानित धार्मिक विद्वानों की राय के अनुसार क्योंकि हदीस या कुरान मे दूसरी शादी के समय पहली पत्नी की अनुमति लेने का कोई साक्ष्य नहीं है, इसलिए मुस्लिम को ऐसा करने की आवश्यकता भी नही ..... दरअसल इन विद्वानों ने नबी सल्ल० की शादियों को पेशे नज़र रखा कि आप सल्ल० ने एक से ज़्यादा औरतों से शादी की और नई शादी से पहले, पहले से मौजूद बीवियों से मशविरा किया हो, ऐसा सबूत नहीं मिलता, .... ये मिसाल देखकर उन विद्वानों ने एक राय कायम कर ली... और दूसरी मिसालों की तरफ़ ध्यान नहीं दिया हो सकता है कि इन विद्वानों की ये राय कुछ देशों के लिए तो ठीक हो...

में स्त्रियों की तुलना कुत्तों और गधों से की गई ?

अबु दाऊद शरीफ़ मे एक हदीस है कि यदि कोई कुत्ता, गधा, सुअर, एक यहूदी, जादूगर या कोई स्त्री किसी बिना किसी खुले स्थान पर नमाज पढ़ते व्यक्ति के करीब से सामने से गुजर जाएं तो नमाज खराब हो जाती है, ( मुस्लिम शरीफ़ के अनुसार नमाज़ मे खलल पड़ जाता है ।) इस हदीस को आधार बनाकर कुछ लोग ये आरोप लगा रहे हैं कि इस्लाम ने स्त्री को कुत्ते और गधे जैसा बताकर स्त्रियों का अपमान किया है ॥ इस आरोप का सबसे अच्छा जवाब बुखारी शरीफ़ की किताब-9, हदीस-493 मे है कि अम्मी आइशा रज़ि. ने जब नबी सल्ल. के समक्ष इस बात पर एतराज़ जताया कि "आप सल्ल. हमारी (स्त्रियों की) तुलना कुत्ते और गधे से कर रहे हैं ??" तो (इस घटना के उपरांत) अम्मी आइशा रज़ी. ने देखा कि नबी सल्ल. अम्मी आइशा के अपने सामने लेटी होने के बावजूद नमाज पढ़ रहे थे ...." ऐसे नमाज पढ़कर नबी सल्ल. ने ये जाहिर कर दिया कि आप सल्ल. ने स्त्रियों को कुत्ते या गधे जैसा नहीं माना था, और यदि नमाजी के आगे जाने की मनाही को किसी भली स्त्री ने अपना अपमान समझा हो, तो प्यारे नबी सल्ल. ने स्त्रियों को अपमानित नही किया है । वास्तव मे इस हदीस का मंतव्य ये है ...

विवाहित दास स्त्रियों के साथ सेक्स...??

बहुत से लोगों को मैंने पवित्र कुरान की सूरह निसा की 24वीं आयत में ये लिखा होने कि "विवाह के लिए विवाहित स्त्रियाँ भी वर्जित है, सिवाय उनके जो तुम्हारी लौंडी हों।" पर ये सवाल उठाते देखा है कि यहां मुसलमानों को ये आदेश दिया गया है कि "मुस्लिमों के लिए तमाम विवाहित स्त्रियाँ हराम हैं , सिवाय युद्ध मे कब्जे मे आई हुई विवाहित स्त्रियों के" आयत पर अपने हिसाब से अनुमान लगा कर ये लोग आरोप लगाते हैं कि इस्लाम मुस्लिमों को युद्ध मे जीती गई स्त्रियों के "बलात्कार" करने की खुली छूट देता है .... हालांकि ये सत्य नही है, बलात्कार वो होता है जब कोई व्यक्ति विवाह से इतर किसी स्त्री की इच्छा के विरुद्ध उससे जबरन यौन सम्बन्ध बनाता है .... इस्लाम के नियमों का ऐसी किसी स्थिति को अनुमति देने से दूर दूर तक का वास्ता नही है...!! . .... सबसे पहले ये भ्रम दूर कर लीजिये कि क़ुरआन 4:24 में दासियों से बिना विवाह के शारीरिक संबंध की अनुमति दी गई है.... ऐसा नहीं है .... वास्तव मे कुरान मजीद मे सूरह निसा (सूरह नम्बर-4) की आयत 22,23, 24 और 25 मे उन स्त्रियों का ज़िक्र है जिनसे एक मुस्लिम...

इस्लाम में पुरुष को एक से अधिक विवाह की अनुमति क्यों ?

मेरे इनबॉक्स मे एक मित्र ने सवाल पूछा है कि इस्लाम मे पुरुष को बहुविवाह की अनुमति क्यों दी गई है, और जब एक मुस्लिम एक समय में सिर्फ चार पत्नियां रख सकता है तो नबी सल्ल० ने 12 विवाह क्यों किये ??.... इसका उत्तर मैं पहले दे चुका हूँ, उसे ही री-पोस्ट कर रहा हूँ । इस्लाम मे पुरूष को अनेक विवाहो की अनुमति की बात सुनकर लोग इसे पुरूषों की मौज मस्ती से ही जोड़कर देखते हैं ... पर वास्तव मे ऐसा नही है ..॥ रसूल करीम सल्ललहो अलेह व सल्लम के ज़माने में जब युद्ध में अनेक मुसलमान मारे गये और उनकी विधवा औरतों ,और उनकी लड़कियों के आगे जीवन यापन का संकट खड़ा हो गया, और क्योंकि युद्ध मे बड़ी संख्या मे मारे जाने के कारण मुस्लिम पुरूषों की संख्या मुस्लिम स्त्रियों के मुकाबले काफी कम हो गई थी , इसलिए तब उन बेसहारा विधवाओं और लड़कियों को सहारा देने के लिए यह व्यवस्था दी गयी थी कि एक मुस्लिम पुरुष एक से अधिक उतनी स्त्रियों से विवाह कर ले जितनो का वो भरण पोषण कर सके , ये विवाह भी तब हो सकता है जब पुरुष की पहली पत्नी को इस विवाह से कोई आपत्ति या तकलीफ न हो ॥ .... इसी व्यवस्था के तहत नबी सल्ल० ने भी बहुविवाह कि...

चार गवाही, व्यभिचार और स्त्री

बहुत वक्त से मैं इण्टरनेट पर शरिया कानून के खिलाफ लोगों को बेसिर पैर की अफवाहें उड़ाते देखता आ रहा हूँ कि इस्लामी कानून मे अगर किसी औरत के साथ बलात्कार हो जाए, तो दोषी को सजा दिलवाने के लिए उस पीड़िता को अपने पर हुए बलात्कार के चार चश्मदीद गवाह अदालत मे पेश करने पड़ेंगे, तभी मुजरिम को सजा होगी, और यदि पीड़िता चार गवाह न ला सकी उस औरत को ही शरिया कानून व्यभिचारिणी मानकर सजा देगा ....... क्या मूर्ख आक्षेप है ....??? यदि ऐसा कानून हो, तो फिर तो मुस्लिम मुल्क मे कभी किसी बलात्कारी को सजा ही न हो ..... क्योंकि बलात्कार कभी चार आदमियों, और वो भी विपक्षी आदमियों के सामने कोई नही करता है ! फिर तो कोई औरत कभी अपने ऊपर हुए ज़ुल्म के बारे मे बोलने की हिम्मत ही न करेगी, और सारे बलात्कारी मुस्लिम देशों मे खुले घूमते रहेंगे .... लेकिन ऐसा नही है, सब जानते हैं, कि मुस्लिम देशों मे बलात्कार करने वालों को बराबर सजा मिलती है, और वो भी बहुत सख्त सजा ॥ अस्ल मे चार गवाह वाला मसला बलात्कार नही बल्कि व्यभिचार (आपसी सहमति से अवैध शारीरिक सम्बन्ध बनाना ) का है , जैसा कि आप जानते हैं, कि इस्लाम मे व्यभिचार क...