इस्लाम में बिना विधिवत विवाह दासी से सम्बन्ध ?
प्रारम्भिक दौर के इस्लाम की एक व्यवस्था पर एक प्रश्न अक्सर पूछा जाता है कि प्राचीन समय मे मुस्लिमों को बिना विधिवत विवाह के अपनी दासी से शारीरिक सम्बन्ध बनाने की अनुमति क्यों दी गई थी? क्या ये किसी स्त्री का शोषण और व्यभिचार नही..??....... आइए इसका उत्तर जानने की कोशिश करते हैं ..॥
सोचिए कि आपके शहर का रेड लाइट एरिया बंद करवा दिया जाए और आपसे कहा जाए कि उन शरीर बेचने वालियों से आप शादी कर के उनके जीवन यापन का सहारा बन जाएं तो कितने लोग राज़ी होंगे इसके लिए ?? सोच मे पड़ गए न ?
प्री इस्लामिक अरब समाज मे दो प्रकार की दासियां होती थीं एक तो वे जो या तो किसी गुलाम स्त्री से पैदा होने के कारण जन्म से ही गुलाम होती थीं या फिर किसी गरीब और जाहिल घराने मे पैदा होती थीं और अपने ही घरवालों द्वारा बचपन मे ही बेच दी जाती थीं , और ये प्रचलित था कि गुलाम की अपनी कोई इच्छा अनिच्छा नही होती, बल्कि उसको खरीदने वाला उस गुलाम का जैसे भी चाहे, उपयोग या उपभोग करे, प्रीइस्लामिक अरब में एक गुलाम स्त्री को अपना शरीर अपने मालिक को सौंपना ही पड़ता था, वो किसी भी प्रकार से अपने सतीत्व को बचाकर नही रख सकती थी, .... दूसरे प्रकार की गुलाम वे इज्जतदार घरों की स्त्रियाँ होती थीं जिन्हें युद्ध मे उनकी सेना की पराजय के बाद गुलाम बना कर अरब के गैर मुस्लिम उन स्त्रियों की इच्छा अनिच्छा की चिंता के बगैर उनसे भी हर प्रकार का काम लेने के साथ ही साथ उनके शारीरिक शोषण भी किया करते थे
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क्योंकि क़ुरआन में सूरह मुहम्मद, सूरह 47, की चौथी आयत में स्पष्टता से ये विधान दे दिया गया है कि युद्धबन्दियों को मुसलमान सदा के लिए गुलाम बनाकर नही रख सकते, बल्कि या तो उनसे कुछ अर्थदंड लेकर उन्हें रिहा कर दें, या बिना कुछ लिए, एहसान के तौर पर रिहा कर दें.... इसके सिवाय तीसरा कोई रास्ता युद्धबन्दियों के लिए क़ुरआन ने नही बताया है ...
.... अतः इस्लाम मे जिन दासियों के साथ बिना विधिवत विवाह के केवल दासी की सहमति मिल जाने पर ही उस से ताल्लुक बनाने की इजाजत दी गई है ये उपरोक्त पहले प्रकार की यानि जन्म से बनी दासियां थीं, अन्य कोई दासी नहीं .... ये वे दासियां थीं जिनके शरीर को काफिरों ने कई बार खरीद बेच के भोगा था.... मुस्लिमों को ये आदेश दिया गया कि इन औरतों को सदा के लिए अपना लें, ताकि इनका आगामी जीवन सम्मान और आराम के साथ बीते....
इन औरतों से ताल्लुक बनाने के साथ ही मुस्लिमों पर जीवन भर इनका भरण पोषण करना अनिवार्य यानी फर्ज़ हो गया और इनके बच्चों को अपना नाम देना और उन बच्चों का पालन पोषण करना व उन्हें सम्पत्ति मे हिस्सेदार बनाना भी फर्ज हो गया
और क्या इन औरतों से मुस्लिमों को बिना विवाह किए ही सम्बन्ध बनाने की अनुमति दी गई थी ? इस्लाम मे विवाह किन्हीं कर्मकाण्डो के होने से हुआ नहीं माना जाता बल्कि वर वधू द्वारा एक दूसरे को दिल से पति पत्नी मान लेने और एक दूसरे के प्रति प्रतिबद्ध रहने यानि वफादार रहने की प्रतिज्ञा से हुआ माना जाता है ... इसी कारण नबी स. के समय भी मूर्तिपूजक धर्म छोड़कर साथ साथ इस्लाम कुबूल करने वाले दम्पति का न कभी दोबारा इस्लामी रीति से निकाह करवाया गया न ही आज भी ऐसी स्थिति मे इस्लाम कुबूल करने वाले दम्पति का दोबारा निकाह करवाया जाता है ... बल्कि उनके पिछले धर्म के गैर इस्लामी नियमानुसार हुए विवाह को ही मान्यता दी जाती है ... क्योंकि उसी विवाह के समय से वे एक दूसरे के प्रति प्रतिबद्ध हैं ।
इसी तरह क्योंकि मुस्लिमों ने अपनी कनीज़ों की मर्ज़ी जानी और उसके बाद दोनों ने एक दूसरे को दिल से अपना पति पत्नी मान लिया इसलिये उनका विवाह भी सम्पन्न ही हुआ
किसी घर परिवार वाली लड़की से विवाह करते समय गवाह और काज़ी आदि उस लड़की के घरवाले, अपनी बेटी के भविष्य की सुरक्षा के लिए और समाज मे अपना सम्मान बनाए रखने के लिए बुलाते हैं, ताकि दुनिया जान ले कि उनकी बेटी ससम्मान फ़लाँ शख्स के घर उसकी पत्नी बन के चली गई है
लेकिन क्योंकि उन दासियों का कोई घर परिवार ही नहीं था और वो पहले से ही अपने मालिकों के घर मे रह रही थीं, और पुराने अरब रिवाज़ के कारण समाज पहले से ही उनके मालिकों को उन कनीज़ों के शरीर का अधिकारी मानकर उन कनीज़ों को कुंवारी नही मानता था, इसलिए समाज को दिखाने के लिए कर्मकाण्ड करने का न कोई फायदा था और न कोई ज़रूरत, हां लेकिन ये जरूरी था कि क्योंकि उन लड़कियों के पिता और भाई जैसे कोई संरक्षक नहीं थे, अत: उन लड़कियों के भविष्य की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी मुस्लिम स्वयं उठाएं, और उन कनीज़ों से शरीर सुख लेने के बाद मुस्लिम उन्हें काफिरो की तरह किसी और के हाथों बेच न दें, बल्कि हमेशा अपनी पत्नी होने का सम्मान अधिकार और प्यार दें, जो कि मुस्लिमों ने दिया ।
कुछ हदीसों से प्रतीत होता है कि मुस्लिमों ने युद्ध में गैरमुस्लिमों को पराजित करने के बाद उनकी स्त्रियों को गुलाम बनाकर रख लिया था, .... ये ज़रूर वो स्त्रियां थीं जो कुफ़्फ़ार के यहां भी ग़ुलाम थीं और कुफ़्फ़ार उन्हें मुसलमानों से युद्ध लड़ने जंग के मैदान में ले आये थे... इन्हीं पहले से गुलाम स्त्रियों को मुस्लिम उन स्त्रियों की सहमति से अपने वास रख सकते थे, किसी आज़ाद रही स्त्री को नही.. जो स्त्रियां पहले आज़ाद थीं, उन्हें गुलाम बनाकर रख लेना तो इस्लाम की प्रकृति के ख़िलाफ़ है , बुख़ारी शरीफ़ और अबू दाऊद शरीफ़ ने नबी सल्ल० की हदीस है जिसमें किसी भी आज़ाद मर्द-औरत को गुलाम बनाना बहुत बड़ा गुनाह बताया गया है....
दरअसल युद्ध मे पराजित लोगों को मुस्लिम दुश्मनी निकालने के लिए प्रताड़ित करने को नही बल्कि इस कारण दास बनाते थे क्योंकि एक तो उस समय युद्धबन्दियों को जेल में बंद करके रखने वाली वो व्यवस्था नही थी जो आज विश्व भर में प्रचलन में है, बल्कि उस समय युद्धबन्दियों को विजेता समुदाय के घरों में घरेलू नौकरों के तौर पर रखे जाने की व्यवस्था थी, जिस व्यवस्था की स्वीकार्यता होने के कारण इसका पालन मुस्लिमों ने भी खास उद्देश्यों से किया.... इन बंधकों के बदले मुस्लिम गैरमुस्लिमों से उनके पास बंधक मुस्लिम बन्दियों को छुड़ाने के समझौते कर सकते थे जैसे कि सही मुस्लिम में मुस्लिमों के पास बंधक बने कबीले बनु फ़ज़ारा के युद्ध बन्दी स्त्री पुरुषों का ज़िक्र है जिनके बदले गैरमुस्लिमों से एक समझौता कर के मुस्लिम युद्ध बन्दियों को मुस्लिमों ने आज़ाद करवाया था.... इस प्रकार के बंधक स्त्रियों और पुरुषों से इस कारण कोई अपमानजनक व्यवहार भी मुस्लिम नही करते थे, ताकि यदि किसी समझौते के तहत गैरमुस्लिमों के यहाँ बन्दी मुस्लिमों को छुड़वाया न भी जा सके, तो भी उनके यहां बन्दी मुस्लिम बंधकों के साथ अच्छा व्यवहार करने की उन गैरमुस्लिमों को सन्मति मिले.....इसी नाते ऐसी युद्धबन्दी स्त्रियों के साथ भी मुस्लिम पक्ष का कोई व्यक्ति प्रणय निवेदन भी नही कर सकता था, शारीरिक संबंध बनाने की बात तो बहुत दूर है, ये बात भी बनु फ़ज़ारा के युद्ध बंधकों वाली ही रिवायत में पता चल जाती है जब एक मुस्लिम व्यक्ति को घरेलू नौकरानी के तौर पर दी गई बनु फ़ज़ारा की एक सुंदर युद्धबन्दी स्त्री पसन्द आ गई थी पर वे इस हदीस में कम से कम तीन स्थानों कसम खाकर कहते कि मैंने उस स्त्री को कभी भी नही छुआ... और अंततः गैरमुस्लिमों के साथ मुस्लिमों का समझौता हुआ और दोनों तरफ के युद्धबन्दियों को एक दूसरे के बदले रिहा कर दिया गया, और वो स्त्री जैसी पवित्र मुस्लिमों के पास गुलाम बनकर आई थी, वैसी ही पवित्र उसके लोगों के पास वापस पहुँचा दी गई
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