स्त्री का सम्मान, तय करते हैं संस्कार और संस्कारों को तय करता है धर्म
देश मे इतनी अधिक संख्या मे बलात्कार क्यों हो रहे हैं ? क्या सिर्फ कानून का कमजोर होना ही इसकी एकमात्र वजह है ? फिर ये सवाल उठता है कि कानून तो देश के उन हज़ारों सभ्य पुरुषों के लिए भी कमज़ोर है जो बलात्कार क्या स्त्रियों पर गलत नजर तक नहीं डालते ... क्या वे सभी मर्द नही ??
असल बात ये है कि कानून की बात दीगर रही, अहम बात है बचपन से मिलने वाले संस्कार, जो व्यक्ति की अच्छी या बुरी शख्सियत बनाते हैं .... अगर किसी लड़के को बचपन से पराई स्त्रियों का सम्मान करना सिखाया जाता है, तो वो बड़ा होकर ऐसा ही करेगा, और अगर किसी के मन मे बचपन से ये बात बैठ जाए कि औरत केवल भोगने की चीज है, तो फिर वो बड़ा होकर औरत के शरीर पर ही भूखी नजर डालेगा औरत की गरिमा पर नहीं....
तो ये संस्कार हमें धर्म से मिलते हैं, और भाग्य से हमारे देश का लगभग हर व्यक्ति किसी न किसी धर्म मे आस्था जताता है
फिर हमारे देश मे इतनी बड़ी संख्या मे बलात्कार क्यों ???
असल मे देखने को मिलता है कि बलात्कार और व्यभिचार जो कि बलात्कार तक पहुंचने का चोर दरवाज़ा है, उसे किसी अन्य धर्म ने उतने स्पष्ट ढंग से जघन्य पाप नहीं बताया जितने स्पष्ट ढंग से इस्लाम ने बताया है, और न ही व्यभिचार और बलात्कार पर उतने कठोर दण्ड निर्धारित किए जितने इस्लाम ने, .... या तो अन्य धर्म इन विषयों पर मौन रहते हैं, या हल्के दण्ड की बात करते हैं, बल्कि कई बार तो विरोधाभासी बातें भी इन विषयों मे धर्म कर देते हैं यानि कुलीन स्त्रियों के बलात्कार को महापाप, और निम्नवर्गीय या शत्रु पक्ष की स्त्रियों के बलात्कार को शौर्य बता देते हैं ... कई बार प्रेम प्रकरण आदि मे विवाह पूर्व छल से स्त्री का शील भंग करना भी स्वीकार्य मानते हैं, ... ये परिभाषाएं और वर्गीकरण पूरी तरह गलत और समाज के लिए घातक हैं ... क्योंकि कहीं न कहीं इन बातों से यही शिक्षा जाती है कि स्त्री भोग की वस्तु है ...... बहुत बार पतिव्रत धर्म के बहाने जब स्त्री से पति के हर अत्याचार को चुपचाप सह लेने की अपेक्षा की जाती है, और घर की स्त्रियाँ दुख और अपमान सह कर भी विरोध न कर के इन बातों को भुलाकर सामान्य व्यवहार करती रहती हैं, तो उन घरों मे पलने बढ़ने वाले बच्चे यही सीखते हैं कि स्त्री पुरुष की ऐसी गुलाम होती जिसमें एहसास नहीं होते, अच्छी स्त्रियों पर अपमान और हिंसा का असर नहीं पड़ता ये सोच भी समाज मे होना स्त्रियों की सुरक्षा के लिए बहुत घातक है ॥
इस मामले मे हम देखते हैं कि इस्लाम पत्नियों से भी नरमी का व्यवहार करने की शिक्षा मुस्लिमों को देता है ताकि बच्चे स्वस्थ माहौल मे पलें बढ़े और इस्लाम शत्रु की स्त्री को भी उतना ही सम्मान देने की अपेक्षा एक मुस्लिम से करता है जितना सम्मान वो मुस्लिम अपनी मां व बहन को देता है ।
फिर इन धार्मिक कानूनों का सख्ती से पालन हो इसलिए परलोकवाद पर और स्वर्ग नर्क पर विश्वास करना ज़रूरी है ताकि व्यक्ति को हमेशा ये एहसास रहे कि उसका कोई भी पाप या पुण्य ईश्वर से छिप नहीं सकता भले ही वो देश के कानून से छिप जाए, और यदि व्यक्ति कोई गम्भीर पाप कर के दुनिया के कानून से बच भी जाएगा तब भी ईश्वर की अदालत मे पहुंचने पर वो नर्क के बड़े कष्टप्रद दण्ड का भागी बनेगा, ... इस आस्था के कारण व्यक्ति खुद को कुकर्म करने से भरसक रोकेगा ...
पर आश्चर्य है कि व्यभिचार और बलात्कार आदि के दोषी को नर्क मे दण्ड के विषय मे इस्लाम के अतिरिक्त कहीं स्पष्ट वर्णन नही मिलता
... इसीलिए हमारे देश के बहुत से व्यक्ति बलात्कार को एक छोटी सी बात मानने की भूल कर बैठते हैं, जबकि बलात्कार के कारण किसी स्त्री का पूरा जीवन नर्क से बदतर हो जाता है ।
अस्ल मे धर्म मे स्पष्ट विधानों का न होना एक बहुत बड़ा कारण है जिससे आज हमारे देश मे बहू बेटियों की सुरक्षा इस कदर खतरे मे पड़ी हुई है ।
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