विवाहित दास स्त्रियों के साथ सेक्स...??
बहुत से लोगों को मैंने पवित्र कुरान की सूरह निसा की 24वीं आयत में ये लिखा होने कि "विवाह के लिए विवाहित स्त्रियाँ भी वर्जित है, सिवाय उनके जो तुम्हारी लौंडी हों।" पर ये सवाल उठाते देखा है कि यहां मुसलमानों को ये आदेश दिया गया है कि "मुस्लिमों के लिए तमाम विवाहित स्त्रियाँ हराम हैं , सिवाय युद्ध मे कब्जे मे आई हुई विवाहित स्त्रियों के" आयत पर अपने हिसाब से अनुमान लगा कर ये लोग आरोप लगाते हैं कि इस्लाम मुस्लिमों को युद्ध मे जीती गई स्त्रियों के "बलात्कार" करने की खुली छूट देता है ....
हालांकि ये सत्य नही है, बलात्कार वो होता है जब कोई व्यक्ति विवाह से इतर किसी स्त्री की इच्छा के विरुद्ध उससे जबरन यौन सम्बन्ध बनाता है .... इस्लाम के नियमों का ऐसी किसी स्थिति को अनुमति देने से दूर दूर तक का वास्ता नही है...!!
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.... सबसे पहले ये भ्रम दूर कर लीजिये कि क़ुरआन 4:24 में दासियों से बिना विवाह के शारीरिक संबंध की अनुमति दी गई है.... ऐसा नहीं है
.... वास्तव मे कुरान मजीद मे सूरह निसा (सूरह नम्बर-4) की आयत 22,23, 24 और 25 मे उन स्त्रियों का ज़िक्र है जिनसे एक मुस्लिम पुरुष का विवाह करना हराम है और हलाल है, आयत 22 इन शब्दों के साथ शुरू होती है कि "उन स्त्रियों से विवाह न करो" .... यानी यहां आयत 22 से लेकर विवाह के लिए वैध और अवैध स्त्रियों की बात शुरू होती है और आयत 25 तक ये विवाह की बात चलती है, और इसी विषय के अंतर्गत आयत 24 भी है कि विवाह के लिए दास स्त्रियां भी वैध हैं,
... 4:24 मे लिखा है कि तमाम विवाहित स्त्रियों से भी विवाह करना हराम है, इस बात को पूरा करने के बाद दूसरी बात कही गई है कि वो स्त्रियां हलाल हैं उचित ढंग से तुम्हारी मिल्कियत में आई हों, .... यानि यहां विवाहित दासी की बात नहीं है, केवल दासी की बात है ..... ऐसी दासी, जिसका पति नही हो...!!
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लेकिन बहुत से अनुवादकों ने इस आयत में ब्रैकेट में लिख लिखकर यही बात कहनी चाही है कि यहां काफ़िरों से विवाहित स्त्रियों को मुस्लिमों के कब्जे में आने के बाद मुस्लिमों के लिए हलाल ठहराने की ही बात है....
.... चलिये एक बार उस पर भी विचार कर के देख लें कि अगर ऐसा ही हो, तो इस्लाम के दूसरे नियमों के कारण क्या सूरत पैदा होगी ??
.... इस्लाम के आम नियम के मुताबिक एक विवाहिता स्त्री का दोबारा तभी विवाह हो सकता है जबकि उसका पहला पति उसको तलाक दे चुका हो, अथवा मर चुका हो,
मान लेते हैं कि उपरोक्त आयत में मुस्लिमों के पास युद्धबन्दी विवाहित मुश्रिक स्त्रियों से मुस्लिमों के विवाह वैध होने की बात ही कही गई होगी, जबकि वो स्त्रियाँ मुस्लिम पुरूषों से विवाह करने के लिए स्वयं इच्छुक हों, .... जैसा कि आप जानते हैं कि मुस्लिम विवाह मे वर और वधू, दोनों की स्वतंत्र अनुमति ली जानी आवश्यक है, यही नीयम दासी के लिए भी है.... बुख़ारी शरीफ़ की किताब-86, हदीस-100 में स्पष्ट तौर पर लिखा है कि जब तक एक ग़ुलाम स्त्री किसी से विवाह के लिए सहमति न दे, उसका विवाह नही किया जा सकता...(◆)
... लेकिन एक मुश्रिक स्त्री से विवाह करने के लिए उसकी सहमति के अलावा एक शर्त और भी है, जो पूरी न हो तो मुस्लिम पुरुष उस स्त्री से विवाह कर ही नहीं सकता.....
.... पवित्र कुरान मे अल्लाह का आदेश है कि एक मुस्लिम पुरुष किसी मुश्रिक स्त्री से विवाह नही कर सकता, जब तक कि वो स्त्री ईमान न ले आए, एक मुश्रिक स्त्री से विवाह करने से बेहतर है कि एक ईमान वाली, अर्थात् मुस्लिम दासी से विवाह कर लिया जाए ॥
[अल-कुरआन, 2:221]
और यही हुक्म पवित्र कुरान 4:25 में भी दिया गया है कि ईमान वाली, यानि मुस्लिम दासियों से ही विवाह किया जाए, [★]
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..... अर्थात् 4:24 मे यदि विवाहिता दासी की एक मुस्लिम से पुनर्विवाह के लिए हलाल (वैध) होने की बात हो, तो भी वो अनुमति तभी के लिए हो सकती है जब वो दासी अपनी खुशी से मुसलमान हो गई हो
और उन औरतों के अपनी इच्छा से मुसलमान हो जाने के बाद उनके मुश्रिक पतियों उनका से विवाह खुद ही टूट जाएगा . . . . जैसा कि सूरह मुमताहिना की दसवीं आयत में लिखा है " ऐ ईमान लानेवालो! जब तुम्हारे पास ईमान की दावेदार स्त्रियाँ हिजरत करके आएँ तो तुम उन्हें जाँच लिया करो। यूँ तो अल्लाह उनके ईमान से भली-भाँति परिचित है। फिर यदि वे तुम्हें ईमानवाली मालूम हो, तो उन्हें इनकार करनेवालों (अधर्मियों) की ओर न लौटाओ। न तो वे स्त्रियाँ उनके लिए वैद्य है और न वे उन स्त्रियों के लिए वैद्य है। और जो कुछ उन्होंने ख़र्च किया हो तुम उन्हें दे दो और इसमें तुम्हारे लिए कोई गुनाह नहीं कि तुम उनसे विवाह कर लो, जबकि तुम उन्हें महर अदा कर दो..."
यानि ले देकर उपरोक्त सारे मामले का क्रियान्वयन स्त्री की खुद की मर्जी होने के बाद ही हो सकता है, अन्यथा नही... और मुशरिक के साथ विवाह में रही और बाद में मुसलमानों के पास दासी बन गई स्त्री से मुसलमान के विवाह के वैध होने की स्थिति ऐसी ही ठहरेगी, जैसे किसी तलाकशुदा अथवा विधवा स्त्री से विवाह किया जाता है !!
वैसे फिर कहूंगा कि वो आयत विवाहिता दास स्त्रियों की बात नही कह रही है, बल्कि केवल नस्लन दासी की बात कर रही है जिसका विवाह अरब के मूर्तिपूजक समाज में कभी किया ही नहीं जाता था, और बिना विवाह के उसे भोगा जाता था... उन स्त्रियों के लिए आयत में आदेश आया है कि मुस्लिम उन्हें अपनी पत्नी का दर्जा दे दें...
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.... रहीं अरब के मूर्तिपूजकों या गैरमुस्लिमों की आज़ाद स्त्रियां जो मुस्लिमों से युद्ध के बाद मुसलमानों के पास बन्दी बना ली जाती थीं, उनके लिए तो अल्लाह ने सूरह मुहम्मद में स्पष्ट आदेश दे ही दिया है कि"जंग के कैदियों को या तो फिदया लेकर रिहा कर दो, या एहसान के तौर पर बिना कोई क़ीमत लिए ही उन्हें रिहा कर दो"....(47:4).... अब रिहा होने के बाद या पहले ही यदि इन स्त्रियों में से कोई खुद ही किसी मुस्लिम से विवाह करना चाहेगी तो स्वेच्छा से मुस्लिम बनने के बाद उसका विवाह मुस्लिम से वैध होगा... पर यहां ज़बरदस्ती और बलात्कार जैसी कोई संभावना नहीं बनती !!!
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(◆ दास स्त्री की सहमति के बिना उसका विवाह न होने की बात ये सिद्ध करती है कि किसी भी प्रकार की दासी की इच्छा के बगैर उसको एक मुस्लिम द्वारा हाथ नहीं लगाया जा सकता)
(★ क़ुरआन की इन दोनों आयतों यानी 2:221 और 4:25 से ये भी सिद्ध होता है कि अल्लाह ने मुस्लिमों द्वारा बांदियों से विवाह करने को वरीयता दी है.)
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