इस्लाम में पुरुष को एक से अधिक विवाह की अनुमति क्यों ?

मेरे इनबॉक्स मे एक मित्र ने सवाल पूछा है कि इस्लाम मे पुरुष को बहुविवाह की अनुमति क्यों दी गई है, और जब एक मुस्लिम एक समय में सिर्फ चार पत्नियां रख सकता है तो नबी सल्ल० ने 12 विवाह क्यों किये ??.... इसका उत्तर मैं पहले दे चुका हूँ, उसे ही री-पोस्ट कर रहा हूँ । इस्लाम मे पुरूष को अनेक विवाहो की अनुमति की बात सुनकर लोग इसे पुरूषों की मौज मस्ती से ही जोड़कर देखते हैं ... पर वास्तव मे ऐसा नही है ..॥ रसूल करीम सल्ललहो अलेह व सल्लम के ज़माने में जब युद्ध में अनेक मुसलमान मारे गये और उनकी विधवा औरतों ,और उनकी लड़कियों के आगे जीवन यापन का संकट खड़ा हो गया, और क्योंकि युद्ध मे बड़ी संख्या मे मारे जाने के कारण मुस्लिम पुरूषों की संख्या मुस्लिम स्त्रियों के मुकाबले काफी कम हो गई थी , इसलिए तब उन बेसहारा विधवाओं और लड़कियों को सहारा देने के लिए यह व्यवस्था दी गयी थी कि एक मुस्लिम पुरुष एक से अधिक उतनी स्त्रियों से विवाह कर ले जितनो का वो भरण पोषण कर सके , ये विवाह भी तब हो सकता है जब पुरुष की पहली पत्नी को इस विवाह से कोई आपत्ति या तकलीफ न हो ॥ .... इसी व्यवस्था के तहत नबी सल्ल० ने भी बहुविवाह किये ... नबी सल्ल० ने हज़रत आयशा सिद्दीका रज़ि० के अलावा जितनी भी स्त्रियों से विवाह किये उनमे कोई भी स्त्री कुँवारी नही थी, बल्कि वे विधवा थीं या तलाकशुदा थीं... !! फिर नबी सल्ल० से विवाह बहुत सम्मान की भी बात थी स्त्रियों के लिये इसलिये भी नबी सल्ल० को ज़्यादा विवाह प्रस्ताव भेजे गए जिन्हें नबी सल्ल० ने स्वीकार कर लिया !! . .... ये नियम कि एक पुरुष सिर्फ चार स्त्रियों से एक समय में विवाह सम्बन्ध रख सकता है, ये हमारे भारतीय संविधान के मुस्लिम पर्सनल लॉ में निर्धारित नियम है, .... इस्लाम में पत्नियों की तय संख्या नही बताई गई बल्कि जितनी स्त्रियों का भरण पोषण एक मुस्लिम व्यक्ति कर सके एवं जितनी स्त्रियों को एक साथ रखकर पत्नी के सभी अधिकार दे सके वो उतनी पत्नियां रख सकता है ...... इतिहास में मुस्लिम बादशाहों नवाबों आदि के बहुत से उदाहरण भारत में भी हैं जिनकी चार की संख्या से अधिक, यानि सात, आठ या इनसे भी अधिक पत्नियां एक ही समय में थीं....!!! . . अत: स्पष्ट है कि इस्लाम में एक से अधिक शादी की व्यवस्था मौज मस्ती के लिए नहीं, बल्कि गरीब, विधवा, तलाकशुदा, अनाथ बेसहारा औरतों को सहारा देने के लिए दी गई है . जिन लोगों को ये लगता है कि अनेक स्त्रियों से विवाह करने की अनुमति मुस्लिम पुरूषों की मौज मस्ती के लिए है, वे ध्यान दें कि मौज मस्ती के लिए पुरुष द्वारा एक से अधिक विवाह करने की स्थिति तो तब बनेगी, जब पुरुष अन्य स्त्रियों के सम्पर्क मे आए, उनके रूप सौन्दर्य पर मोहित हो जाए, लेकिन क्योंकि इस्लाम मे गैर स्त्री पुरूषों के आपस मे अनावश्यक ढंग से घुलने मिलने, और अकारण गैर स्त्री पुरुष की ओर नजर उठाकर देखने की भी मनाही है इसलिए एक प्रैक्टिसिन्ग मुस्लिम व्यभिचार या दूसरी शादी के बारे मे सोच भी नहीं सकता, बल्कि उसके लिए तो दुनिया की सबसे सुंदर औरत उसकी अपनी पत्नी ही होगी तो जिस समाज मे स्त्री पुरुष का घुलना मिलना आम हो वहीं मौज मस्ती के लिए लोग पहली पत्नी को नाराज कर के दूसरी शादी कर लेते हैं, न कि इस्लामी व्यवस्था मे । भले ही भारत मे मुस्लिम पुरूषों के लिए एक से अधिक स्त्रियों से विवाह की कानूनन अनुमति हो, पर मैंने अपने जीवन मे आज तक किसी प्रैक्टिसिन्ग मुस्लिम को एक से अधिक विवाह किए हुए नहीं देखा .... हां वे मुस्लिम जो इस्लाम से दूर रहकर बेरोक टोक पराई स्त्रियों से घुलते मिलते थे उन्हीं मे एक समय मे एक से अधिक विवाह के मामले देखने मे आए, ठीक इसी कारण से कि लोग पराई स्त्रियों मे घुलते मिलते थे हिन्दू समाज के पुरूषों द्वारा भी एक समय मे एक से अधिक शादियों के मामले मैंने देखे... जबकि भारतीय हिंदू विधि मे पुरूष का एक समय मे एक से अधिक विवाह करना कानूनन अपराध की श्रेणी मे रखा गया है खैर इस्लाम मे पुरुष द्वारा एक से विवाह की व्यवस्था देने का कारण था कि तलाकशुदा और विधवा स्त्रियों को जीवन यापन का सहारा मिल जाए , फिर चाहे उनसे कुंवारे पुरुष शादी कर लें या शादीशुदा पुरुष .... और इस आदर्श को मुस्लिम युवक अब भी निभाते हैं, क्योंकि अब इतिहास की तरह मुस्लिम पुरूषों की संख्या की कोई कमी नहीं है अत: आज के समय मे अपने आसपास मैने बहुत से कुंवारे मुस्लिम पुरूषों को तलाकशुदा और विधवा स्त्रियों से विवाह करते और उस विवाह को निभाते देखा है ॥ इस्लाम मे बहुपत्नि प्रथा के विषय मे ये कहना ज्यादा उपयुक्त होगा कि क्योंकि उस समय मुस्लिम पुरुष बड़ी संख्या मे युद्ध मे मारे गए थे जिस कारण मुस्लिम पुरूषों की तादाद मुस्लिम महिलाओं के मुकाबले बहुत कम हो गई थी जिस कारण हर शादी लायक महिला को अकेला या कुंवारा पुरुष नही मिल सकता था, इस कारण एक पुरुष का एक से अधिक स्त्रियों से विवाह करना पूरी तरह तर्कसंगत था .... और क्योंकि जिस ज़माने मे अरब मे इस्लाम का नुज़ूल हुआ वहाँ के मर्द अनेक औरतों से शादी करते ही थे .... लड़कियों के दिमाग मे बचपन से ही ये बात बैठी होती थी कि उनके होने वाले शौहर उनके साथ और कई लड़कियों से भी जरूर ही शादी करेंगे, क्योंकि ये सारे समाज का हाल था इसलिए औरतों को अपने पति की अनेक शादियों से विशेष आपत्ति नही होती थी, उन्होने इस बात को मानसिक तौर पर स्वीकार कर रखा था कि उनके पति जब मरजी हो दूसरी शादी कर सकते हैं, अत: यदि उन स्त्रियों की शारीरिक, मानसिक और आर्थिक आवश्यकताएं पूरी होती रहती थीं तो वे अपने पति की अनेक शादियों को अपने अधिकारों के हनन के रूप मे नही देखती थीं, और प्रसन्न रहती थीं जब इस्लाम मे पुरुष द्वारा एक से अधिक विवाह पर सवाल कर रही कुछ बहनों से मैंने ये कहा कि इस्लाम में एक से अधिक शादी की व्यवस्था मौज मस्ती के लिए नहीं, बल्कि उन बेसहारा औरतों, जिनका भला सोचने वाला सगा सम्बन्धी जीवित नहीं बचा था, उन को सहारा देने के लिए खुद पुरुषों का आगे आना सुनिश्चित हो जाए, इसके लिए है , तो वे बहनें मुझसे कहने लगीं कि मुस्लिम पुरुष उन बेसहारा स्त्रियों को क्या उनका बाप और भाई बनकर सहारा नहीं दे सकते थे, जो एक साथ अनेक औरतों से विवाह की व्यवस्था बनानी पड़ी ? अस्ल बात तो ये है कि पुरूषों को बेसहारा स्त्री को सहारा देने की कीमत भी उन स्त्रियों से अपनी हवस की आग बुझा कर चाहिए थी, लगता है उन बहनों ने ये कल्पना कर ली थी कि बेसहारा और बेघर स्त्रियों को अपने घर मे शरण देने के एवज मे मुस्लिम पुरुषों ने उन स्त्रियों की इच्छा के विरुद्ध उनसे विवाह कर लिए लेकिन ये उन बहनों की कल्पना मात्र ही है, क्योंकि इस्लाम मे बिना स्त्री की इच्छा के उसपर गलत नजर डालना भी हराम है, उनके शरीर को छूने की बात तो दूर ही रही बेघर लड़की को कोई पुरुष अपने घर मे शरण दे, तो भी उस लड़की की इच्छा के विरुद्ध पुरुष उससे विवाह नहीं कर सकता और एक मुसलमान होने के नाते उसे उस लड़की को भी अपनी बहन बेटी सा ही सम्मान देना होगा .... समझने वाली बात तो ये है कि क्या जो सगे ही बाप और भाई होते हैं ,वो अपनी बहन बेटियों से अधिक प्रेम के नाम पर उन की शादी नही करते ? क्या उन्हें जीवन भर घर बिठा के रखते हैं ? जी नहीं बहन बेटी से मोहब्बत का तकाज़ा ये है कि अच्छे पालन पोषण के बाद किसी सुयोग्य वर से उसका विवाह कर के उसका सुखद भविष्य भी सुनिश्चित कर दिया जाए लेकिन जब इस्लाम ने अनाथ बेसहारा हो गई लड़कियों का विवाह करा कर उनका सुखद भविष्य सुनिश्चित करने का आदेश मुस्लिमों को दिया तो गलत तरीके से बात को सोचकर हमारी कुछ बहने बुरा मान गईं इस्लाम ये नही कहता कि जो पुरुष जिस बेसहारा लड़की को सहारा दे, उसी से बिना उस लड़की की इच्छा के विवाह कर ले, बल्कि इस्लाम तो मुसलमान को ये शिक्षा देता है कि जिन मुस्लिम लड़कियों के मां बाप भाई और सगे सम्बन्धी युद्ध मे मारे गए, और वे लड़कियां अकेली हो गईं तथा उनकी चिंता करने वाला कोई न रहा, तो ऐसी बेसहारा लड़कियों को समर्थमुस्लिम सहारा दें इन लड़कियों को सहारा देने वाला पुरुष बेसहारा लड़की को अपने घर की स्त्रियों के संरक्षण मे दे दे , और उनको अच्छा खिलाये पहनाये, तथा उनको अच्छी तालीम दिलाये फिर जब वो लड़कियां शादी लायक हो जाएं तो जहाँ उन लड़कियों की इच्छा हो वहीं उन की शादी करवा दी जाए अब क्योंकि सहारा देने वाला पुरुष वास्तव मे तो उन लड़कियों का बाप या भाई नही है इसलिए वो पुरुष भी उस समय उन लड़कियों के समक्ष अपना विवाह प्रस्ताव भेज सकता है, और लड़की चाहे तो उससे अपनी इच्छा से विवाह कर भी सकती है इसके साथ ही इस्लाम ने उन स्त्रियों से विवाह करने के लिए प्रेरित किया जिन स्त्रियों के पति युद्ध मे मारे गए थे या जिन स्त्रियों को उनके मुस्लिम हो जाने के कारण उनके गैर मुस्लिम पतियों ने त्याग दिया था, वे स्त्रियाँ अपने मां बाप के घर लौट आई थीं .... और एकाकी जीवन काट रही थीं, उस समय उनसे विवाह करने लायक युवा मुस्लिम पुरुष भी मुस्लिम समाज मे नही बचे थे अत: इस्लाम ने मुस्लिमों को यही आदेश दिया कि ऐसी बेसहारा हो गई तलाकशुदा अथवा विधवा गरीब स्त्रियों के घर मुस्लिम पुरुष विवाह का प्रस्ताव भेज दें .... या इन स्त्रियों के घर से यदि किसी मुस्लिम पुरुष के घर विवाह का प्रस्ताव आए तो उस प्रस्ताव को पुरुष स्वीकार कर लें .... इसमें क्या बुराई है ??

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