मुस्लिम पुरुष का दूसरा विवाह, और पहली पत्नी की सहमति की आवश्यकता
कुछ महीनों पहले इस्लाम मे बहुविवाह की अनुमति पर पोस्ट करते समय मैंने ये लाइन भी उसमें शामिल करी थी कि दूसरी शादी मर्द तभी कर सकता है जब उस की पहली पत्नी को इस विवाह से कोई आपत्ति या तकलीफ न हो ॥
इस बात पर कई मुस्लिम भाईयों ने मेरा विरोध किया कि दूसरी शादी के लिए पुरुष को पहली पत्नी की इजाज़त की कोई जरूरत नही है, और मै लोगों को गलत संदेश दे रहा हूँ .... आज फिर ये बात उठी तो मै समझता हूँ कि इस मुद्दे पर इस्लाम की शिक्षा से मैने जो सीखा है वो स्पष्ट कर दूं,
कुछ सम्मानित धार्मिक विद्वानों की राय के अनुसार क्योंकि हदीस या कुरान मे दूसरी शादी के समय पहली पत्नी की अनुमति लेने का कोई साक्ष्य नहीं है, इसलिए मुस्लिम को ऐसा करने की आवश्यकता भी नही ..... दरअसल इन विद्वानों ने नबी सल्ल० की शादियों को पेशे नज़र रखा कि आप सल्ल० ने एक से ज़्यादा औरतों से शादी की और नई शादी से पहले, पहले से मौजूद बीवियों से मशविरा किया हो, ऐसा सबूत नहीं मिलता, .... ये मिसाल देखकर उन विद्वानों ने एक राय कायम कर ली... और दूसरी मिसालों की तरफ़ ध्यान नहीं दिया
हो सकता है कि इन विद्वानों की ये राय कुछ देशों के लिए तो ठीक हो , मगर यही राय भारत समेत कई देशों के लिए बिल्कुल अनुपयुक्त ही सिद्ध होगी.....
उसका कारण ये है कि पुराने वक्त मे मर्द चाहे कितनी शादिया करे, अगर औरत के हुकूक पूरे होते रहते थे तो उसे अपने पति की अनेक शादियो से भी फर्क नहीं पड़ता था और उसे कोई तकलीफ न महसूस होती थी ,
जिस ज़माने मे अरब मे इस्लाम का नुज़ूल हुआ वहाँ के मर्द अनेक औरतों से शादी करते ही थे .... लड़कियों के दिमाग मे बचपन से ही ये बात बैठी होती थी कि उनके होने वाले शौहर उनके साथ और कई लड़कियों से भी जरूर ही शादी करेंगे, क्योंकि ये सारे समाज का हाल था इसलिए औरतों को अपने पति की अनेक शादियों से विशेष आपत्ति नही होती थी, उन्होने इस बात को मानसिक तौर पर स्वीकार कर रखा था कि उनके पति जब मरजी हो दूसरी शादी कर सकते हैं, अत: उस समय पुरुष को दूसरी शादी के लिए पहली पत्नी से इजाजत लेने की भी आवश्यकता शायद न रही हो ....
और जिन देशों मे पुरुष आज भी अनेक शादियां करते हैं, वहां आज भी स्त्रियाँ अपने पति की दूसरी पत्नी के स्वागत के लिए बचपन से मानसिक तौर पर तैयार रहती हैं, तो वहां के लिए बात उपयुक्त है कि पुरुष के दूसरे विवाह मे पहली स्त्री के दखल की कोई जरूरत नहीं ( किन्तु पहली स्त्री के सारे अधिकार और प्रेम उसे पहले की तरह मिलते रहने चाहिए )
खैर हम बात भारतीय मुस्लिम समाज के परिप्रेक्ष्य मे करें, तो हालात बिल्कुल ही जुदा हैं, आज भारत समेत अनेक देशों मे मर्द के एक बीवी के रहते दूसरी शादी करने को बहुत बुरी बात समझा जाता है ..... आमतौर पर मर्द एक औरत के रहते दूसरी शादी करते भी नही, ऐसे मे कोई औरत ये नही सोचती कि उसका पति उसके होते दूसरी शादी कर सकता है ... वो मानसिक तौर पर अपने पति की दूसरी शादी के लिए बिल्कुल तैयार नहीं होती ..
और कहीं मर्द अचानक ऐसा कर गुज़रे तो तो औरत को बहुत बड़ा ज़हनी सदमा पहुंचता है ये उसके लिए कोई छोटी बात नही है बल्कि उसकी पूरी ज़िन्दगी डांवाडोल हो जाती है अचानक के इस धक्के से
फिर चाहे मर्द ने कितनी ही नेकनीयती से ये काम किया हो ....
इस्लाम की रूह को समझिए ...
इस्लाम की तालीम है कि अपनी बीवी को अपने सुलूक से किसी किस्म की ईज़ा न दो ..... इसलिए एक मुस्लिम को अपनी निकाही बीवी की खुशी का हर हाल मे खयाल रखना होता है ..... कुरान पाक मे हुक्म है कि बीवी भली बुरी चाहे जैसी लगे, लेकिन मर्द अपनी बीवी से नेक सुलूक किया करे और
हदीस पाक मे भी बार बार मर्द को ये ही तालीम दी गई है कि वो अपनी बीवी की अच्छाई और बुराइयों समेत उसे स्वीकार कर उस से भला सुलूक करे.....
तो क्या ये भला सुलूक होगा कि आप उससे पूछे बगैर, या उसे राजी किए बिना उसके हक का बंटवारा कर दें ??
हदीस में भी आप ध्यान दें तो ये तालीम मिलती है कि अगर मर्द के दूसरे निकाह से पहली बीवी को तकलीफ़ हो तो दूसरे निकाह से मर्द को रुक जाना चाहिये, बुख़ारी शरीफ़ में कम अज़ कम दो जगह एक सी हदीसें रिवायत की गई हैं, कि हज़रत अली रज़ि० के दूसरे निकाह के लिये बनु हिशाम बिन अल मुगीरा ने अपनी बेटी के लिये अली रज़ि० का रिश्ता मांगा पर नबी सल्ल० ने ये कहते हुए इस निकाह की इजाज़त देने से इनकार कर दिया कि "जो बात मेरी बेटी (फ़ातिमा रज़ि०) को तकलीफ़ दे, वो बात मुझे तकलीफ़ देगी" (बुख़ारी, किताब-62, हदीस-157),
दूसरी हदीस में अबु जहल की बेटी से हज़रत अली रज़ि० के निकाह की बात छिड़ने पर हज़रत फ़ात्मा रज़ि० इस बात की शिकायत नबी सल्ल० करती हैं और नबी सल्ल० ये फ़रमा कर उस निकाह की इजाज़त नहीं देते कि "फ़ातिमा रज़ि० जिस बात से नफ़रत करती हैं, मैं भी उससे नफ़रत करता हूँ" (बुख़ारी, क़िताब-57, हदीस-76)
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निष्कर्ष ये है कि मर्द को दूसरी शादी करने से पहले अपनी पहली बीवी को विश्वास में लेना ही चाहिये, अगर उसका दूसरी शादी करने का कारण जायज़ होगा तो हमने ऐसी भी औरतें देखी हैं जो सहर्ष अपने पति की दूसरी शादी करवाती हैं, ... हमारे भाई सम्भवत: दूसरी शादी मे पहली स्त्री को विश्वास मे लेने का खतरा इसलिए नही लेना चाहते क्योंकि पहली बीवी तो इसके लिए तैयार ही न होगी, और चार शादी करने के अल्लाह के आदेश मे शैतान की तरह रोड़ा अटका देगी ....
.... ये विचार बिल्कुल गैर इस्लामी हैं, क्योंकि अल्लाह ने मर्द के लिए आम हालात मे एक ही बीवी को पसंद फरमाया है, और बहुविवाह की सिर्फ इजाज़त है इस्लाम मे, इसका कोई सख्त हुक्म नही जिसे करना ही पड़े
...... सूरह निसा की आयत 2-3 पढ़िए, पहले तो बगैर बेसहारा औरतों से शादी किए उनकी मदद करने का हुक्म है फिर अगर किसी को ये लगे कि वो इस तरह से उन औरतों, लड़कियों की मदद नही कर पाएगा तो उनमें से जो पसंद हों उनमें से 2,3 या 4 लड़कियों से शादी कर ले,
फिर इन्हीं आयतों में आगे ये भी लिखा है कि लेकिन अगर ये डर हो कि उनके साथ एक सा सुलूक न कर पाओगे, तो बस एक शादी करो, और एक शादी मे इन्साफ की ज्यादा सम्भावना है
..... तो देेखिए, ये आयतें बिना ज्यादा शादियां करे उन बेसहारा औरतों की मदद करने की तालीम पर शुरू होती हैं, और एक शादी की वकालत पर खत्म होती है ...
एक से ज्यादा शादी की अनुमति तो अल्लाह ने किसी मजबूरी की अवस्था में, या आदमी की नफ्स की कमजोरी के कारण दी है इस हिदायत के साथ कि वो सारी पत्नियों के साथ एक समान व्यवहार करे, ... लेकिन सारी पत्नियों के साथ पूरी तरह एक सा व्यवहार करना भी मुश्किल है ये भी अल्लाह ने सूरह निसा की आयत 129 मे बता दिया है
4:129 "तुम चाहे कितनी भी कोशिश कर लो, दो पत्नियों के बीच पूरी तरह इन्साफ का सुलूक नहीं कर सकते , लेकिन ऐसा भी न करना कि एक पत्नी ऐसी हो जाए जैसे उसका पति खो गया हो....."
ज़ाहिर है एक से ज्यादा शादी की इजाज़त पसंदीदा नहीं है जिसमें किसी न किसी औरत के साथ नाइन्साफी की नौबत जरूर आती है, पर क्योंकि उस वक्त मुसलमान मर्द कम थे तो मजबूरी मे ही एक मर्द को कई बीवियां रखनी पड़ीं .....
लेकिन आम हालात मे एक मुसलमान को अपनी बीवी का किसी भी तरीके से दिल नहीं दुखाना चाहिए, क्योंकि ईमान मे मुकम्मल होने, और मुसलमानों मे बेहतर मुसलमान बनने के लिए ज़रूरी है कि मर्द अपनी बीवी को खुश रखे
नबी (सल्ल0) ने फरमाया, "ईमान में सबसे ज्यादा मुकम्मल वह आदमी है जिसकी आदत और अख्लाक सबसे अच्छें हों तथा तुम मे सबसे बेहतर वो है, जो अपनी बीबी के साथ सबसे अच्छा बर्ताब करता हो।"
अल-तिरमिज़ी 628
फिर ध्यान दीजिए सूरह निसा की आयत पर जहां अल्लाह पाक का फरमान है कि अगर मर्द को ये अंदेशा है कि वो एक से ज्यादा बीवियों के साथ इन्साफ से काम नही ले सकेगा तो वह एक ही बीवी रखे, .... तो दूसरी शादी के मामले मे पहली बीवी की राय और मर्जी को जानना बिल्कुल जरूरी न समझना क्या पहली बीवी के साथ इन्साफ की बात होगी ???
ये तो दूसरी शादी होने के पहले ही पहली बीवी के साथ नाइन्साफी का सुलूक करने पे आमादा होने वाली बात हो गई...
... आज के दौर मे किसी बेवा तलाकशुदा औरत को सहारा देना चाहे, तो आदमी को चाहिए कि उसके लिए नेक अकेला, विधुर या तलाक़शुदा ही मुसलमान मर्द ढूंढ कर उनकी शादी करवा दे ...क्योंकि आज मुसलमान मर्द तादाद मे कहीं कम नही हैं, लेकिन फिर भी अगर कोई अकेला मर्द इस नेकी के लिए न मिल पाए, तो जो भी शादीशुदा मर्द दूसरी शादी करने चले वो पहले अपनी पहली बीवी को पूरी तरह विश्वास मे ले और पत्नी की अनापत्ति के बाद ही विवाह करे... यही एक अच्छे मुसलमान का आचरण है ॥
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